Sunday, 1 November 2009

उत्तर कबीर और अन्य कविताएं: एक विवेचन


1995 में केदारनाथ सिंह का कविता संग्रह 'उत्तर कबीर और अन्य कविताएं' प्रकाशितहुआ। इस संग्रह में सबसे तेज कोई अनुभूति परिलक्षित होती है तो वह है विस्थापन की, जिसका आरम्भ उनके पिछले संग्रह 'अकाल में सारस' में ही हो गया था किन्तु इसमेंविस्थापन की पीड़ा का दोहरा स्तर देखने को मिलते है। तीन अन्य तत्त्व भी हैं जो इससंग्रह में विशेष ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं उसमें एक है प्रश्नाकूलता, दूसराएक खास तरह की अध्यात्मिकता और तीसरा भाषा, अर्थ व विचार से जुड़े उपकरणों कोकविता के लिए प्रायः द्वितीयक बनाने का कौतुक करते हुए स्वायत्तता प्रदान करना।
केदार जी में 'विस्थापन का भाव शहर में हो रहे विस्थापन की आशंका से आता है, जो जैसा कि था, पहलेप्रतिरक्षा के भाव की ही उपज था। यहां कवि पर शहर का दबाव, बल्कि शिष्ट का दबाव, इतना ज़्यादा है किबार-बार वह गांव की ओर जाता है। पहले यह एक लाचारी रहा है, बाद में यह आत्मविश्वास व आत्म-प्रसरणका कारण भी बना। इस रूप में कवि स्मृतियों की भी रक्षा का उपाय सोचता है। 'अकाल में सारस' और 'उत्तरकबीर और अन्य कविताएं' संकलनों में यह दबाव अधिक दिखता है। (शुक्ल, श्रीप्रकाश, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 125)
पिछले संग्रह में गांव और शहर दोनों के प्रति विस्थापन का भाव नहीं था। पिछले संग्रह में महानगर दिल्ली कामिज़ाज उन्हें परेशान करता था और वे गांव के गहरी आसक्ति की कविताएं लिख पाये थे किन्तु गांव में भी उसीविस्थापन बोध को महसूस नहीं किया था जो दिल्ली में था। इस संग्रह तक आते-आते उन्हें यह आभास हो जाताहै कि गांव में भी वे परदेसी ही हो चुके हैं-
'अपनी सारी गर्द
और थकान के साथ
अब आ तो गया हूं
पर कैसे साबित हो
कि उनकी आंखों में
मैं कोई तौलिया या सूटकेस नहीं
मैं ही हूं
छू लूं किसी को
लिपट जाऊं किसी से
मिलूं
पर किस तरह मिलूं
कि बस मैं ही मिलूं
और दिल्ली न आये बीच में।' (सिंह, केदारनाथ, गांव आने पर, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, राजकमलप्रकाशन, नयी दिल्ली, 1995, पृष्ठ 12 )
दिल्ली में विस्थापन बोध की कविता है 'कुदाल', जिसमें कुदाल के माध्यम से कहा गया है कि किस प्रकार वहांगांव-देहात उपकरण विस्थापित हो जाते हैं। गांव से लगाव रखने वाले व्यक्ति के लिए गांव जुड़ी वस्तुओं व बोधका विस्थापित होना भी उसका अपना विस्थापन ही है-
'अन्त में कुदाल के सामने रुककर
मैंने कुछ देर सोचा कुदाल के बारे में
सोचते हुए लगा उसे कंधे पर रखकर
किसी अदृश्य अदालत में खड़ा हूं
पृथ्वी पर कुदाल के होने की गवाही में
पर सवाल अब भी वहीं था
वहीं जहां उसे रखकर चला गया था माली
मेरे लिए सदी का सबसे अधिक कठिन सवाल
कि क्या हो-अब क्या हो कुदाल का
क्योंकि अंधेरा बढ़ता जा रहा था
और अंधेरे में धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था
कुदाल का क़द
और अब उसे दरवाज़े पर छोड़ना
ख़तरनाक़ था
सड़क पर रख देना असंभव
मेरे घर में कुदाल के लिए ज़गह नहीं थी।' (सिंह, केदारनाथ, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, कुदाल, पृष्ठ
गांव के विकास और बदलाव को भी वे सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाते। वे गांव के उस पुराने आत्मीय दृश्यको खोजते हैं जो नहीं मिलता और उन्हें आहत करता है, उनमें टीस और कसक पैदा करता है-
'कुत्ते भूंकते हैं
जैसे कुत्ते भूंकते हैं
पर स्थान
और समय के बीच
जहां भी फांक थी
उसे सीमेंट से अच्छी तरह
भर दिया गया है
और अब यह सब
एक लय में है
यहां तक कि एक लय है
महामारी के जाने
और दूरदर्शन के आने में भी
आना नहीं पड़ता
अब डाकिये को शहर से
थैला लटकाए हुए
यहीं कहीं रहता है
दस
या बीस घर बाद
पर दिखता नहीं है अब
मां को वह कहीं भी
वह तो उसे जानती थी
उसके बड़े थैले के
हिलने के छंद से
बाहर से
नहीं मिलता उत्तर
तो कभी-कभी ख़ुद से ही
पूछती है वह-
यह कैसे हुआ
कि डाकघर आया
और खो गया डाकिया?'
(सिंह, केदारनाथ, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, विकास कथा, पृष्ठ 42/43)
दिल्ली के सभ्य जगत के परिवेश के तौर-तरीके उनके लिए आहतकारी हैं-
'कौन हैं ये लोग
जो कई बार बग़ल से गुज़रते हुए
मेरे इतने पास होते हैं-इतने अधिक पास
कि इनकी सांसों का स्पर्श
उड़ा देता है मेरी चिन्दियां
इनकी आंखों की चुप्पी
उधेड़ लेती है मेरी खाल
कौन हैं ये लोग
जिनसे दूर-दूर तक
मेरा कोई रिश्ता नहीं
पर जिनके बिना
पृथ्वी पर हो जाऊंगा
सबसे दरिद्र।'(सिंह, केदारनाथ, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, जो रोज़ दिखते हैं सड़क पर, पृष्ठ 94)
अपनी रचनाओं में दिल्ली और गांव के अंतरसम्बंध को उजागर करते हुए स्वयं केदार जी कहते हैं- 'दिल्लीआकर शायद दिल्ली के कंट्रास्ट के चलते मैंने अपने गांव को अपने भीतर ज़्यादा खोजने और पाने की कोशिशकी। मेरी गांव से जुड़ी ज़्यादातर कविताएं इसी दौर में लिखी गयीं। एक विचित्र बात यह है कि पिछले दिनों गांवजाकर भी मैंने उसी विस्थापन का अनुभव किया जो दिल्ली में करता हूं। मेरे जैसे बहुत से लोगों की विडम्बना यहहै कि अपना मूल निवास तो छूट गया, पर जहां रहते रहे उसके साथ घर जैसी आत्मीयता कभी नहीं बनी। इससारी स्थिति का मेरी कविता पर ख़ास प्रभाव है, जिसे स्पष्ट ही लक्ष्य किया जा सकता है।' (मेरेसाक्षात्कार: केदारनाथ सिंह, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2003, पृष्ठ 136)
केदारनाथ सिंह की इधर की कविताओं में प्रश्नाकूलता बढ़ी है। प्रश्न उनके काव्य स्वभाव का हिस्सा रहा हैकिन्तु इस संग्रह में प्रश्न व्यापक स्थान घेरता है। यह प्रश्न ही है जो यह बताया है कि वे गहरे संशय में औरसंशय की स्थिति उन्हें विविध दिशाओं में ले जाती है। प्रश्न स्वयं अपने से भी हैं और जग से भी। आत्म औरपर का अलगाव यूं भी उनके यहां बहुत सम्भव नहीं है। कहना न होगा कि सार्थक प्रश्न स्वयं अपने में उत्तरभी होते हैं और यहां भी हुआ है। कई कविताओं का समापन ही प्रश्न से हुआ है। 'गांव आने पर' कविता में वे पूछतेहैं-
'क्या है कोई उपाय
कि आदमी सही-साबूत निकल जाये गली से
और बिल्ली न आये बीच में?'(पृष्ठ 12)
'कुदाल' में वे कहते हैं-
'मेरे लिए मेरी सदी का सबसे कठिन सवाल
कि क्या हो-अब क्यो हो कुदाल का? '(पृष्ठ 18)
'नमक' कविता में सवाल है-
'न सही दाल
कुछ-न-कुछ फीका ज़रूर है
सब सोच रहे थे
लेकिन वह क्या है?' (पृष्ठ 20/21)
'पंचनामा' कविता में वे पूछते हैं-
'अब दोष किसे दूं
पुलिस को
कि लाश को?' (पृष्ठ 23)
'घर का विचार' कविता में पूछते हैं-
'अब इस पर बहस से
कोई फ़ायदा नहीं
कि उसने जो हवा से कहा-थू..
उसके दायरे में
सिर्फ़ कुंडी आती थी
या पूरा घर? '(पृष्ठ 26)
'विकास-कथा' में उनका सवाल है-
'यह कैसे हुआ
कि डाकघर आया
और खो गया डाकिया? '(पृष्ठ 43)
'हस्ताक्षर' कविता में भी सवाल खड़ा है-
'पर अब सवाल यह था
कि तय कैसे हो
और हो तो किस अदालत में
कि कौन-सा हस्ताक्षर जाली है
मेरा या हवा का?' (पृष्ठ 48)
'आंकड़ों के धुंधलके में' कविता में लोग इस प्रश्न से जूझ रहे हैं-
'पर कहां गया पैसा?
कौन-से जोड़ से घट गया था वह?
छिप गया था जाकर
किस गुणा-भाग के अंधेरे कोने में?' (पृष्ठ 51)
'जिसे भेजा गया दूसरे शहर में' कविता की पंक्तियां देखें-
'ठीक अपनी नाक की सीध में
भागा जा रहा था वह
यह सोचता हुआ
कि उस शहर की बत्तियां (किस शहर की?)
अगर अब भी नहीं दिखीं
तो उस अन्तहीन सड़का पर
उसे मुड़ना कहां होगा?' (पृष्ठ 57)
'खरोंच' कविता में वे कहते हैं-
'मैं इस खरोंच को लेकर
पंढरपुर जाना चाहता हूं
लेकिन पंढरपुर क्यों? '(पृष्ठ 61)
दरअसल अपनी प्रश्नाकूलता का जवाब वे अपने प्रश्नों वाली ही एक कविता में यूं देते हैं-
'जो सड़ रहा है
और ज़ाहिर है कि बहुत-कुछ है
जो कि सड़ रहा है
क्या मैं उसे बचा सकता हूं
कविता लिखकर?
फिर क्यों यह तम्बू
क्यों यह तामझाम
क्यों यह अश्लीलता हार की
और पुरस्कार की
क्यों नहीं भट्ठी गरमाना
क्यों नहीं साइकिल में हवा भरना
क्यों नहीं पत्तल में
सींके लगाना
क्यों नहीं
आख़िर क्यों नहीं सोचना
कि सोचने से पहले और सोचने के बाद
जो बच जाता है ढेर सारा
उसे रखा कहां जाय?'
वे कविता, सभ्यता, जीवन के तामझाम और मनुष्य की नियति से जुड़े सवालों को उठाते हैं औचित्य पूछते हैं।सोचने के पहले और सोचने के बाद के बचे के प्रश्न ही उन्हें अर्थवान बनाते हैं। वही चिन्तनशीलता की आग कोबचाये रखता है और यही वह मार्ग है जो उन्हें अध्यात्म की ओर ले जाता दीखता है। क्या यह अनायास है कि वेकबीर पर लम्बी कविता लिखते हैं और संत तुकाराम के गांव पंढरपुर जाने के बारे में पूछते हैं। कवि के तौर पर वेप्रश्न पूछने के औचित्य का उत्तर देते हैं-
'पूछो कि पूछने से भाषाएं
ज़िन्दा रहती हैं।' (पृष्ठ 85)
भाषा के सम्बंध में भी इस संग्रह में बेहद संशय में हैं और इस बात की लगातार शिनाख्त करते दिखायी देते हैं किभाषा कहां है, कैसे बचेगी और कहां विफल है, कहां विकसित किये जाने की आवश्यकता है और इस क्रम में उन्हेंइस बात का आभास भी होता है कि भाषा को अभी विकसित होना बचा है-
'जितनी वह चुप थी
बस उतनी ही भाषा
बची थी मेरे पास।' (उसकी चुप्पी ,पृष्ठ 89)
'पांचवीं चिट्ठी' कविता में वे कहते हैं-
'और यह भी हो सकता है
कि उस शहर में भाषा ही हो गयी हो गुल
बिजली की तरह
आख़िर भाषा भी तो शहर में
एक बिजली ही है।' (पृष्ठ 93)
'सास्युअर के शब्दों में कह सकता हूं कि केदार मुख्यतः Parole (वाक्) के कवि हैं, Longue (भाषा) के नहीं। भाषाऔर वाक् के बीच जो जटिल तनाव और डिफरेंस है वहीं कहीं केदार जी हैं। वह सही मायनों में भाषा और वाक् कीसारी ताक़त को हस्तामलक कर उसे कौतुक की सीमा तक ले जाते हैं और पूरा लुत्फ लेते हैं। जैसे कोई सिद्धसंगीतकार अपनी उंगलियों से अपने वाद्ययंत्र पर स्वरों एवं सुरों का खेल खेलता हो।' ( त्रिपाठी, अनिल, मिट्टीकी रोशनी, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 201)
वे अपनी भाषा ही नहीं बल्क़ि समूची मनुष्यता की भाषा के लिए बहुत कुछ करने को बेचैन दिखायी देते हैं-
'मुझे मिलना ही होगा
उस दढ़ियल कवि से
जानना ही होगा उसकी भाषा का दुख
उसकी लय के झटके
उसकी चुप्पी की चीर-फाड़
उसका वह लहूलुहान युद्ध
जो सबकी ओर से उसे हर रात लड़ना पड़ता है
अपनी भाषा की सबसे खूंखार तुकों से
मुझे जाना ही होगा ज़िल्दाना
अगर ज़िल्दाना कहीं हो
अगर वह न ह
तो फिर अपने लिए
और अपनी समूची भाषा के लिए
मुझे पैदा ही करना होगा ज़िल्दाना
चाहे जैसे भी हो।' (ज़िल्दाना कहां है, पृष्ठ 115)
यहां ज़िल्दाना के बहाने कवि प्रकारांतर से उनकी भाषा की बात कर रहा है जो मानवेतर हैं या फिर मानव भी हैंतो उनके अव्यक्त पहलुओं व्यथाओं व उल्लास को व्यक्त करने की ज़रूरत महसूस करता है उसे गुरुतर मानताहै। वह मानता है कि भाषा के क्षेत्र में अभी बहुत काम बाकी है। और यही कारण है कि केदारजी इस संग्रह मेंकई स्थानों पर भाषा से लगभग खेलते हुए कविता में कौतुक रचते हैं। वे महसूस करते हैं कि-
'और फिर भी कितना राग है
और कैसी एक लय
दुनिया के सारे अनाप-शनाप
और अगड़म-बगड़म में (उत्तर कबीर, पृष्ठ140)'
इतना ही नहीं वे जानते हैं कि चुप्पी में भी एक भाषा है
'पर यदि दो लोग चुप हों
पास-पास बैठे हुए
तो उतनी देर
भाषा के गर्भ में
चुपचाप बनती रहती है
एक और भाषा।' (कुछ और टुकड़े, पृष्ठ 98)
केदार जी ने जिस ताजा निरक्षरता को बचाने की हिमायत की है वहीं वे खड़े हैं जहां वे वस्तुओं के बारे में बनीगलत अवधारणाओं को ध्वस्त करते चलते हैं या फिर उन्हें नयी अर्थवत्ता प्रदान करने के लिए नये शब्द औरनये मुहावरे गढ़ रहे होते हैं।
कविता में कौतुक रचने की दिशा में भी उनकी कविताएं हैं तस्वीर, दाढ़ी बनाते हुए, आज का बाज़ार भाव, जड़ें, खर्राटे, शिलान्यास, घर का विचार, कुरुक्षेत्र में चाय, न्यूयार्क में क़ब्रिस्तान देखकर, आंकड़ों के धुंधलके में, जिसे भेजा गया उस दूसरे शहर में, खरोंच, मधुमक्खियों का हमला में इसके प्रयास देखे जा सकते हैं। इनकविताओं में भाषा के एक नये बर्ताव या कविता के किसी तार्किक परिणति तक पहुंचने की परवाह नहीं करतेबल्कि वे वस्तु या विषय की अपनी संरचना और स्वभाव पर छोड़ देते हैं। 'प्रकृति के साथ आदिम रिश्ते औरजटिलताओं के बीच भी टटकेपन के अहसास को काव्यात्मक अभिव्यक्त देने का प्रयास किया है। यही कारण हैकि नामवर सिंह को केदारनाथ सिंह के इस संग्रह की कविताओं में धारोष्ण अनुभव की अनुभूति होती है।' (सहाय, निरंजन, केदारनाथ सिंह और उनका समय, शिल्पायन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, 2008, पृष्ठ 151) ये कविताएं कविता के परम्परागत तरीकों के किसी हद तक स्वायत्त हैं। मनुष्येतर संसारको संवेदनशील नज़रिये से देखा गया है और उनके कार्यव्यापार पूरी गरिमा के साथ उपस्थित हैं जैसे 'खुलेपन मेंपहिया'। शायद इन्हीं कविताओं के लिए 'शब्द पर दस्तक' जैसी कविता है जिसमें एक चिड़िया चीं..ची.. चांय..चांयकरती शब्दकोश के पन्नों पर दस्तक दे रही है और वे शब्द जो शब्दकोश के अन्दर चिल्ला रहे हैं ज़गह नहीं हैज़गह नहीं है। और केदार जी कहते हैं-
'देखें-हां देखें
जो देख सकते हों
सुबह-सुबह
एक निरर्थक आवाज़ ने
अर्थ की दुनिया में
कैसा हड़कम्प मचा रखा है।' (शब्द पर दस्तक, पृष्ठ 80)
केदार जी की कविता में एक भव्य क़ब्रिस्तान देखकर जीवितों के मुंह में पानी आ जाता है, तो दाढ़ी बनाते वक़्तशीशे में देखते हुए वे अपने ही हाथ के समाने बिलकुल निहत्था महसूस करते हैं। 'आज का बाजार भाव' कविताअख़बार में व्यापार की खबरों की भाषा में है जिसमें वे जोड़ते हैं-
'गाहक भौंचकक्का
शासन अवाक्
सिर्फ़ एक कौआ
भोलता है हवा में
क्राक
क्राक
क्राक।' ( आज का बाज़ार भाव,पृष्ठ 105)
हालांकि इन कविताओं को उत्तर-आधुनिकता से जोड़ना ग़लत होगा। केदार जी का कहना है कि ' उत्तर-आधुनिकता की अवधारणा पश्चिम से आयी है और वहां इस पद से जो अर्थ लिया जाता है, उस अर्थ मेंमैं अपने को उत्तर-आधुनिक नहीं कहूंगा। हां, इस अर्थ में उत्तर-आधुनिक कोई कहना चाहे तो कह सकता हैकि मेरी कविता आधनुकता के उत्तर चरण में लिखी जाने वाली कविता है।' (सिंह, केदानाथ, केदारनाथ सिंहः मेरेसाक्षात्कार, पृष्ठ 132) उत्तर-आधुनिकता पर कटाक्ष करती हुई एक कविता भी उन्होंने इस संग्रह में लिखीहै-
'बल्कि वे भी
जो किन्हीं लुप्त चरागाहों में
कहीं बची हुई घास के
किसी अन्तिम छोर पर
बकरियां चराते हैं
और चराते-चराते इतना समय हुआ
कि भूल गये हैं
अपने सारे गाने
वे भी
वे भी
वे भी आधुनिक हैं
या उत्तर आधुनिक
या आधुनिक के उत्तर
या पता नहीं क्या?
मेरे कान इन शब्दों से
पक गये हैं।' (विमर्श, पृष्ठ 44) केदार जी में जो नव्यता के आयाम हैं वे समय के ज्वलंत प्रश्नों की टकराहटका परिणाम हैं ना कि हर आने जाने वाले साहित्यिक आंदोलनों की उपज, इसका ताज़ा उदाहरण यह कविता भीहै। यह कविता उस दौर में लिखी जा रही है जब उत्तर-आधुनिकता को शोर हिन्दी साहित्य में भी मचा है।
इस संग्रह तक आकर केदार जी 'पाणिनी से झगड़ते हैं। पाणिनी से मतलब व्याकरण से जहां अर्थ की सारीसंभावनाएं निचुड़ जाती हैं। वैसे भी व्याकरण भाषा का वह उपनिवेश है जहां की सिर्फ़ पक्का माल ही बिकता है।कच्चा माल नहीं। जबकि यह कच्चापन ही कुम्हार की कच्ची मिट्टी की तरह सबसे काम की चीज़ है, फिर तोउस पर निर्भर है वह इसे किस रूप में ढालता है।' ( त्रिपाठी, अनिल, मिट्टी की रोशनी, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 201)
कुछ कविताएं ऐसी भी हैं जिनमें उनकी करुणा अध्यात्म के स्तर तक पहुंची है जिनमें एक है बची हुई करुणा, लोरी, नदियां। यह उनकी अध्यात्मिक ऊंचाई ही है कि वे लिखते हैं-
दरख़्तों की छाल
और हमारी त्वचा का गोत्र
एक ही है
परछाइयां भी असल में
नदियां ही हैं
हमीं से फूटकर
हमारी बगल में चुपचाप बहती हुई नदियां। ( नदियां, पृष्ठ 13)
उनकी करुणा की बानगी देखें-
'रात भर बहती रही यमुना
चमकते रहे तारे-रात भर
और रोता रहा वह
जो कई बार एक कुत्ता था
कई बार एक आदमी
और मेरे अन्दर बजती रही
सरपत के सूखे पत्तों की तरह
मेरी बची हुई करुणा
झन्.. झन्..झन्न.. झन्न।' (बची हुई करुणा, पृष्ठ 87)
शहर में उन्हें ठंड पर कविता लिखते समय सबसे पहले गौरैया याद आती है। उन्हें लगता है वह गौरैया ही है जो ठंडको खूब-खूब पहचानती है और दोनों के बीच बहुत कुछ साझा है। यही साझेदारी वे अपने ठंड और गौरैया के बीचस्थापित करते चलते हैं क्योंकि उनके लिए जो साझा है वही बेहद मूल्यवान है और वह दांव पर लगा हुआ है।व्यापक साझेदारी यह काव्य स्वभाव उन्होंने उत्तरोत्तर विकसित किया है, ठंड और गौरैया कविता की बानगीदेखें-
'मौसम की पहली सिहरन
और देखता हूं
अस्तव्यस्त हो गया है सारा शहर
और सिर्फ़ वह गौरैया है जो मेरी भाषा की स्मृति में
वहां ठीक उसी तरह बैठी है
और ख़ूब चहचहा रही है
वह चहचहा रही है
क्योंकि वह ठंड को जानती है
जैसे जानती है वह
अपनी गर्दन के भूरे-भूरे रोओं को
वह जानती है कि वह जिस तरफ़ जायेगी
उसी तरफ़ उड़कर चली जायेगी ठंड भी
क्योंकि ठंड और गौरैया दोनों का
बहुत-कुछ है
बहुत-कुछ साझा और बेहद मूल्यवान
जो इस समय लगा है
दांव पर..।' (सिंह केदारनाथ, ठंड और गौरैया, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, पृष्ठ 125/126)
'इस संग्रह की कविताओं में कवि विडम्बनाओं और विरूपताओं के बीच सच की तलाश की चेष्टा करता है। इसचेष्टा में संशय और संदेह भी आता है जो ज्ञान-मीमांसा की एक आवश्यक कड़ी होती है। केदार जी अपने बिम्बोंको दैनिक जीवन से चुनते हैं, इससे कविता की सम्वादधर्मिता में बढ़ोत्तरी होती है। 'उत्तर कबीर और अन्यकविताएं संग्रह' में प्रयुक्त यह शैली भक्त कवियों की याद दिलाती है।' (सहाय, निरंजन, केदारनाथ सिंह औरउनका समय, शिल्पायन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, 2008, पृष्ठ 210) केदार जी ने उस वस्तुजगत को पूरी गरिमा दी है जिनके बारे लोग पूरी संवेदनशीलता के साथ नहीं सोचते। उनके संकट को मनुष्य केसंकट से जोड़कर उसके साथ अपने साझेपन को नहीं बांटते। इस क्रम में एक कविता कुएं भी है जिनके धीरे-धीरेबेकार होते जाने पर कवि चिन्तित है। 'कुओं के लोप का अर्थ सिर्फ जल के एक स्रोत का दूसरे स्रोत के आजाने पर अप्रासंगिक होना नहीं है, बल्कि उसके साथ जुड़े सामाजिक सम्बंधों की पूरी संरचना का निरर्थक होजाना है।' (अपूर्वानन्द, मिट्टी की रोशनी, पृष्ठ 117)
इस संग्रह में एक कविता है 'दवा की तलाश में एक बेचैन आत्मा' वह कैंसर से पीड़ित अपनी पत्नी पर उन्होंनेलिखी है।
लोक चरित्रों के माध्यम से लोक संन्दर्भों को उपस्थित करने की प्रवृत्ति बाद के कविता संकलनों में कमहोती गयी है। 'अकाल में सारस' और 'उत्तर कबीर' में नहीं ही है। किन्तु 'उत्तर कबीर' में स्वयं इतिहासप्रसिद्ध नायक है; एक ओर कबीर तो दूसरी ओर भिखारी ठाकुर। दोनों का स्रोत लोक जीवन। प्रत्यक्षआंखिन देखी कवि को बड़ी बातें कहनी होती हैं, जिस कारण से वह दो प्रसिद्ध चरित्रों को चुनता है क्योंकि गढ़ाहुआ चरित्र उसके भावों को गहराई विस्तार में व्यक्त करने के लिए शायद नाकाफ़ी लगा हो। इसमें कवि सफलभी हुआ है। 'उत्तर कबीर' में तो कवि एक लोक नायक को चित्र (स्थूल) के रूप में देखकर परेशान है। वह उस हरप्रक्रिया के विरुद्ध जो एक गतिशील वस्तु को स्थूल बनाती है। इमसें कवि अब तक अर्जित अपने समस्तकाव्यगत शिल्प को प्रयोग भी करता है।'(शुक्ल, श्रीप्रकाश, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007 पृष्ठ131) केदार जी यहां कवि कबीर के नाम की कताई मिल में बुने जाने के विरुद्ध हैंक्योंकि वेच चाहते हैं नाम की गरिमा बनी रहे। नाम से एक पूरी संस्कृति जुड़ी होती है। कबीर सूत मिल नामसुनकर ही वे चक्कर में पड़ जाते हैं। वे स्वयं भी विचार करते हैं और लोगों के सामने प्रश्न भी रखते हैं-
'कुत्ते को लोग
क्यों कहते हैं कुत्ता?
चांद भला चांद क्यों है?
सुबह क्यों सुबह है
शाम क्यों शाम?
अगर बोलना है
तो एक दिन उतारने होंगे
सारे-के-सारे छिलके
और अन्दर झांककर देखना ही होगा
कि आख़िर रिश्ता क्या है
नमक ध्वनि
और नमक के स्वाद में?' (पृष्ठ 139)
इस प्रकार इस कविता में केदार जी चाहते हैं कि लोग इस बात का चिन्तन करें कि कबीर क्या थे, उनके मूल्यक्या थे और उनके नाम पर सूत मिल करने का क्या औचित्य है। क्या कबीरदास महज़ एक जुलाहे थे। क्यावस्तुतः वे सूत ही कातते थे। क्या सूत मिल से उनके नाम को जोड़ देने से उनका सांस्कृतिक अवमूल्यन नहीं होरहा है। क्या यह कबीर के होने के अर्थ और परिव्याप्ति को सीमित नहीं कर रहा है। इन सब पर विचार करतेहुए वे कहते हैं-
'सोचता हूं कि कितना अजीब है
लम्बे समय बाद अपने शहर के होठों पर
घिस-घिस कर एक नाम बन जाना
अपनी भाषा के छिद्रों से छनते-छनते
लोगों की स्मृति में
एक कथा बन जाना
एक रूपक बन जाना
कितना भयावह है
और एक दिन उस सबका
चुपके से बदल जाना कबीर सूत मिल में
कितना शानदार है
और कितना दयनीय।' (वही, पृष्ठ 140) और सारी बातों के बीच और कितना दयनीय कहना ही कवि का मूलमंतव्य है।
कवि समय की विडम्बनाओं की चर्चा करते हुए कहता है यह वह समय है जब-
पानी भूल गया है
आग से अपना रिश्ता
आग को याद नहीं
हवा का स्पर्श
हवा बहती है
गंध से कटी-कटी
गंध से टूट गयी है
पृथ्वी की लय
पृथ्वी से बंद है
आकाश की बातचीत
और फिर वे कबीर सूत मिल नाम पर कटाक्ष करते हैं और इस बड़ी विडम्बना का उल्लेख कि-
'ऐसे में एक विराट महाकाव्य
लोगों के ललाट
और वक्षस्थल से झरता है
और आराम से अंट जाता है
एक छोटे से चुटकुले में।' (उत्तर कबीर, पृष्ठ 137)
यह कविता कबीर के बहाने मौज़ूदा समय में संस्कृति व मूल्यों के स्थिति पर एक तल्ख़ टिप्पणी बन कर सामनेआती है। केदार जी समय के संकट को पकड़ने में पूरी तरह से कामयाब रहे हैं और प्रभावी भी-
'एक सुई खो गयी है
पृथ्वी के दिल में
और दर्ज़ी सुई की नोक में
खो गया है
एक मिट्टी के ढेले में
गुम गया है कुम्हार
और बढ़ई लोप हो गया है
चिरती हुई लकड़ी की गंध में
पथेरा अपने सांचे में
ग़ायब हो गया है
साधक चले गये हैं
शवों की तलाश में
कवि अपने शब्दों की फांक में
लापता है
और स्वाद लौट गया है
फिर से गुठली में।'
यह केदार जी की यह लम्बी कविता है। उन्होंने लम्बी कविताएं बेहद कम लिखी हैं। 'उत्तर कबीर' के अलावाबाघ' ही ऐसी कविता है। हालांकि वह इसके काफ़ी लम्बी है और स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इसमेंवे कबीर के बहाने अपनी सांस्कृतिक धरोहरों, संस्कृति पुरुषों के समाज से जीवित अन्तरसम्बंधों की पड़तालकरते हैं। प्रश्न पूछते हैं और आहत भी होते हैं-
'देखता हूं कि आमी
और दुनिया के बीच
पानी और बानी के जितने रास्ते थे
सब बंद हैं
अब किससे पूछूं
कि पूछना क्या अब ख़ुद कोई रास्ता नहीं है?' (उत्तर कबीर, पृष्ठ 134)
केदार जी दरअसल गतिशील को स्थूल बनाने के पक्षधर नहीं बल्कि स्थूल को गतिशील बनाने के हिमायती रहेहैं। उनकी बहुचर्चित कविता 'मांझी का पुल' अपनी स्थूलता के कारण नहीं बल्कि गतिशीलता के कारणमहत्त्वपूर्ण मानी गयी वहां मांझी का पुल एक ठोस भौतिक पुल नहीं रह जाता बल्कि वह लोगों के मानस मेंटंगा एक पुल बन जाता है। उनके अनुसार 'हर पुल में छिपी रहती है एक नाव।' (सिंह, केदारनाथ, ज़मीन पक रहीहै, मांझी का पुल, पृष्ठ 93)
यहां भी जिस तट पर मगहर बसा है वह आमी नदी और कबीर उनके लिए पानी और बानी का रास्ता हैं और कबीरसूत मिल जैसे उपक्रमों से कबीर के स्थूल हो जाने से ये रास्ते बंद हो जाते हैं। वे तो कबीर के उस सूत को पकड़नाचाहते हैं 'जो कहीं से भी खींचो/कहीं से भी तानो/कम पड़ जाता है' (वही, पृष्ठ 135), क्योंकि दुनिया को कबीर केउस सूत की आवश्यकता है जो सांस्कृतिक सद्भाव के लिए ज़रूरी है। न सिर्फ़ कबीर के नाम पर स्थापितलगभग बंद पड़ी इस कताई मिल के कई ख़िलाफ़ है बल्कि वह इसी क्रम में मगहर को कबीर की अमरता केख़िलाफ़ मानने लगता है क्योंकि मगरह स्थूल है-
'अमरता के ख़िलाफ़
एक लम्बी चीख़ की तरह
फैला है मगरह।' (वही, पृष्ठ 134)
केदारनाथ सिंह का भोजपुरी भाषा व संस्कृति से गहरा लगाव रहा है। वे अपने पैतृक गांव में जाते हैं तो भोजपुरी हीबोलते हैं। भोजपुरी भाषा से जुड़े समारोहों में वे चाव से जाते हैं। भोजपुरी नाट्य निर्देशक, अभिनेता व बिदेशियागीत नाटिका (नाच) के रचयिता भिखारी ठाकुर पर भी इस संग्रह में उन्होंने कविता लिखी है जिन्होंने कला केमाध्यम से जनजागरण में भाग लिया था, जो आज़ादी की लड़ाई का ही एक हिस्सा था। आज़ादी की लड़ाई में उनकेजैसे लोक कलाकारों के योगदान के उल्लेख को भी वे आवश्यक मानते हैं , जो इसमें प्रकट हुआ है। 'कला औरजनजागरण के सघन रिश्ते को प्रकट करने के लिए छुरा से छुटने और नृत्य से जुड़ने के प्रसंग को भिखारीठाकुर के कथा-बिम्ब के माध्यम से भिखारी ठाकुर कविता में प्रस्तुत किया गया है।' (सहाय, निरंजन, केदारनाथ सिंह और उनका समय, शिल्पायन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, 2008, पृष्ठ 211) यहतब का प्रसंग है जब एक समारोह में स्वयं केदार जी ने भिखारी ठाकुर को बोलते हुए सुना था। भिखारी ठाकुर नेउस समारोह में बताया था कि पेशे से हजाम थे और कैसे कला में अभिरुचि के कारण उनके हाथ से उस्तूरा छूटगया और नृत्य, गीत, अभिनय को उन्होंने अपना लिया।


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