Friday, 30 October 2009

ताल्सताय और साइकिल : एक विवेचन


ताल्सताय और साइकिलतक आते-आते केदारनाथ सिंह की कविता की बनावट सघन, निहतार्थ संश्लिष्ट और परिव्याप्ति पहले से व्यापक हो चला है। हर कविता का अपना एक स्वतंत्र संसार और जादू है। हर कविता एक एक नया तिलस्म रचती है, उनकी कविता का भूगोल भी बदला-बदला सा है। पहले भी वे स्मृतियों को मूल्यवान मानते थे किन्तु अब उनकी स्मृतियां गांव देहात की स्मृतियां नहीं रह गयी हैं बल्कि वे सभ्यता के विकास की विभिन्न स्मृतियों को आत्मसात कर चुके हैं। यह उनकी अपनी परिचित दुनिया से कत्तई अलग नहीं लगती हैं। कालखंडों का विभाजन उनके यहां मिट गया है। दिवंगत लोगों का संसार जीवितों की बिरादर में लगातार विद्यमान है और दोनों कहीं कोई भेद नहीं। इतिहास से कोई पात्र सहसा प्रकट हो जाता है बोलता बतियाता है चाहे वे तू फू और ली पै हों या दिवंगत पिता और एकाएक गांव छोड़कर चले गये इब्राहिम मियां ऊंटवाले, जिनका बाद में कोई पता नहीं चला। तालस्ताय की साइकिल भी है जो आज तक घंटी बजाती हुई उससे बाहर निकलने का रास्ता खोज रही है। यह काम केदार जी भी करते दिखायी देते हैं इतिहास से बाहर निकलने की कोशिश है बहुत से मूल्यवान तत्त्वों को। यहां कवि कविता के तमाम उपकरणों से कवि खेलता है, उससे एक जादू रचता है और पुराना जादू ध्वस्त करता चलता है। इस संग्रह में एक स्वतंत्र जीवन दृष्टि व काव्य दृष्टि रचते दिखायी देते हैं। काव्य की जिस ज़मीन को तोड़ते हैं वही उर्वरक हो उठती है। शब्द और भाषा उनके इशारों पर अपनी बिसात बिछा देती है और पाठक मंत्रमुग्ध, अवाक्, विस्मित, विह्वल, आह्लादित रह जाता है। लहज़ा ऐसा की वह आक्रांत नहीं करता। विनोद और हास भी गंभीर विवेचनों के साथ। एक बेचैनी जो कवि को चिरपरिचत दुनिया से लेकर नये लोगों, नयी चीज़ों, नये अनुभवों के नये द्वीपों तक ले जाती है और फेंटेसी, स्वप्न, लोककथा, दन्तकथाओं और इतिहास तक की आवाजाही को अनिवार्य बनाये हुए है। यहां वह विस्थापन भी है जो उन्हें मथती रही है आदमी के आग पर चलने के करिश्मे तक पर विश्वास। वे कविता में झूठ और सच का भेद मिटा देते हैं बल्कि वे लोकोक्तियों तक पर यक़ीन कर कविता को विशेष अर्थ देते हैं और उसकी प्रयोजनशीलता को सिद्ध करते हैं। केदार जी की इन कविताओं में विचार दर्शन में तब्दील हो गये हैं। वर्तमान इतिहास से ऐसे घुलमिल गया है कि सब कुछ कालातीत हो गया है।
लगभग पिछले हर संग्रह की तरह उनकी पहली कविता संग्रह की उनकी कविताओं की भूमिका या संकल्प है। यूं यह किसी भी कवि के कर्म के सम्बंध में उतना ही सही है। इसमें वे कहते हैं-
'मेरे निर्माता का आदेश है
देखो और बोलो
बोलो और टंगे रहो
और देखिए न मेरी मुस्तैदी
कि मैं सबकी ओर से बोलता हूं
और बोलता हूं अपने भीतर की सारी सच्चाई के साथ
पर मेरे नेक निर्माता ने
मुझे दी नहीं अनुमति
कि कभी बोल सकूं अपनी तरफ़ से।' (सिंह, केदारनाथ, ताल्सताय और साइकिल, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2005, आईना, पृष्ठ 8)
'मुझे नहीं दी अनुमति
कि बोल सकूं अपनी तरफ़ से' पंक्तियों में वे कवि-कर्म को सामाजिक जिम्मेदारी मानते हैं जहां निहायत व्यक्तिगत के लिए स्थान नहीं है। और इस संग्रह में वे सबकी ओर से बोलते भी नज़र आते हैं। अपनी रचनाशीलता के प्रति भी कहीं-कहीं वे संशय से भरे नज़र आते हैं, और विनम्र लहजे़ के चलये यहां तक कह डालते हैं-
'पूरी कर रहा हूं वह कविता
जिसे लिखना शुरू किया था किसी पुरखे कवि ने
शायद सदियों पहले
और देकता हूं कि नीमअंधेरे में
मैंने यही तो किया है
कि हटा दिया है कोई हलन्त्
लगा दी है कहीं बिन्दी
उलट दिया है कोई विशेषण
उड़ा दी है कोई तिथि
और तुर्रा यह-
कि मैंने कविता की है!' (वही, अपनी ख़बर, पृष्ठ 42)
अपने कवि कर्म पर 'एक ज़रूरी चिट्ठी कविता का मसौदा' कविता में वे लिखते हैं। यहां चिट्ठी के बहाने कविता पर उन्होंने बात की है-
'लिखूंगा
एक न एक दिन ज़रूर लिखूंगा
वह एक ज़रूरी चिट्ठी जो मुझे लिखनी है
पृथ्वी के सारे निवासियों के नाम
xxxxxxx
एक -एक गंध
एक-एक स्पर्श को लिखूंगा
xxxxxxx
एक-एक धड़कन
एक-एक सांस को लिखूंगा
एक न एक दिन ज़रूरी लिखूंगा।' (वही, एक ज़रूरी चिट्ठी कविता का मसौदा, पृष्ठ 80/81)
उनका काव्य-विकास जनोन्मुख है। यह इस काव्य संग्रह में दिखायी देता है-
'अब जाओ में कविताओ
सामना करो तुम दुनिया का
यदि बजता है तो सिर्फ वहीं
यह इकतारा निरगुनिया का
जाओ खोजो, यदि कहीं ज़रा
सी राख पड़ी हो ढाबे में
खोजना वहीं फिर लय अपनी
गलियों के शोर-शराबे में
बिखरें होंगे सब छन्द वहां
सब तुकें वहां लुढ़की होंगी
जो छूट गयी थी पंक्ति, कहीं
कचरे पर वहीं पड़ी होगी।'( सिंह, केदारनाथ, ताल्सताय और साइकिल, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2005, मोड़ पर विदाई, पृष्ठ 136)
पुस्तक की शीर्षक कविता 'ताल्सताय और साइकिल' में वे ताल्सताय की रचना की ताक़त की चर्चा करते हुए कहते हैं-
'और तालस्ताय चूंकि तालस्ताय थे
इसलिए वे एक उदास घोड़े से
कर सकते थे बातें
कर सकते थे कोशिश एक रंगीन चित्र को
कागज़ से उठाकर
जेब में रखने की
दे सकते थे आदेश समुद्र की लहरों को
एक अभय मुद्रा में हाथ उठाकर।' (ताल्सताय और साइकिल, पृष्ठ 68)
कहना ग़लत न होगा कि स्वयं इस संग्रह में और कतिपय अन्य संग्रहों में भी केदार जी भी यही करते हैं। दरअसल वे रचनात्मकता की शक्ति को जांच परख रहे हैं और आश्वस्त भी होना चाहते हैं कि वैसा जादू उनमें जगा है कि नहीं। वे इस संग्रह में उसी जादू को जगाने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि-
'आपकी गली से गुज़रती हुई
एक जर्जर साइकिल की छोटी सी घंटी में
वही जादू है
जो उस दिन था जब ताल्सताल ने पहले-पहले
देखी थी साइकिल।' (ताल्सताय और साइकिल, पृष्ठ 68)
जिस प्रकार ताल्सताय ने पहली बार साइकिल देखी थी और उसकी घंटी जिस प्रकार उन पर जादू किया था केदार जी भी यहां वही दृष्टि विकसित कर पाने में सफल रहे हैं कि ऐसी मामूली वस्तुओं के जादू को पहचान सकें और उस जादू को पाठक को भी दिखा सकें। वे तालस्ताय के साइकिल वाले जादू को इतिहास से बाहर निकालने का प्रयास इस संग्रह में करते हैं। पानी की प्रार्थना, त्रिनीदाद, घोंसलों का इतिहास, पिता के जाने पर जैसी कविताएं में वह जादू सिर चढ़कर बोलता है।
संग्रह की कविता 'घोंषलों का इतिहास' में वे मशीनीकरण और संवेदनहीनता का विकल्प रचते हैं-
'यह सही है कि बाज़ार में मिलते नहीं घोंसले
वहां सिर्फ़ पिंजड़े मिलते हैं
इसलिए टूट जाने के बाद उन्हें हर बार बनाना पड़ता है नये सिरे से
उतने ही धीरज
और उससे भी ज़्यादा जोख़िम के साथ।' (वही, घोंषलों का इतिहास, पृष्ठ 23)
'पिता के जाने पर' कविता उन तमाम लोगों को अपने बुजुर्ग की याद दिलायेगी जो उनकी गतिविधियों और स्थिति के बारे में तनिक भी सोचते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के प्रति सम्मान व आत्मीयता से भरी इस कविता में उनके निज़ी बिम्ब भी हैं। निछक निजता सार्वजनिक भी होती है इसका यह कविता श्रेष्ठ प्रमाण है-
'एक पक्षी से बतियाते हुए पिता को टोकना
सुन्दरता के ख़िलाफ़ है
और इसलिए इस घूमती हुई पृथ्वी की गति के ख़िलाफ़ भी।' (सिंह, केदारनाथ, ताल्सताय और साइकिल, पिता के जाने पर, पृष्ठ 35) केदार जी ने यहां गति को सौन्दर्य से जोड़ा है। और स्वयं केदार जी की कविता में भी गति है जो उसे दिनों दिन और मोहक व सम्मोहक बनाती चली गयी है। 'पोलिश कथाकार ब्रुनो शुल्त्ज के विलक्षण उपन्यास स्ट्रीट आफ क्रोकोडायल्स में बूढ़ा होता पिता चिड़ियों से बातें करता रहता है। स्वयं में निमग्न। एक अन्य काल और लोक में धीरे-धीरे गुम होता हुआ।xxxxxxxxयह कितना आश्चर्यजनक है। इस सदी के एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास की कविता में आवृत्ति।' (प्रकाश, उदय, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 44/45)
उपर्युक्त कविता का अन्त एक तनाव और अन्तर्द्वंद्व से होता है, जो कविता के फलक को विस्तृत और अर्थ को असीम कर देता है। मृत्यु को लेकर भारतीय परम्परा और रीति रिवाज़ भी इसके अवयव बने हैं-
'सबसे तीखा अनुभव मुझे
उस समय हुआ
जब मैंने उन्हें मुखाग्नि दी
वही मुख जिसने मुझे चूमा था बार-बार
जला दिया था मैंने उसे
शास्त्र का आदेश था
और मेरे भीतर का संशय
दोनों मिलकर मंत्र पढ़ते रहे।' (सिंह, केदारनाथ, ताल्सताय और साइकिल, पिता के जाने पर, पृष्ठ 35)
इस कविता में मनुष्य के स्वभाव व स्थिति, मनुष्य के विकास और क्षरण की गतिविधियों को बारीकी से महसूस किया है और उस रहस्यमयता को भी रेखांकित किया है जिसे कोई चाहे तो आसानी से महसूस कर ले, विज्ञान जिसकी अपनी तरीके़ से व्याख्या करेगा किन्तु कविता में तो यह काम केदार जी जैसे समर्थ कवि ही कर सकते हैं-
'यह क्या होता है आदमी के भीतर
कि उसकी चमड़ी के झूलते चले जाने के साथ-साथ
शब्दों में बढ़ने लगता है अर्थ की चमक
और होठों की पपड़ियों से
छनकर आता है जाने वह क्या कुछ
एक शिशु के पहले स्तनपान की महक जैसा। '(वही, पृष्ठ 34 )
'आग पर चलने का करिश्मा' कविता में वे तर्कों के परे जाने पर संकोच नहीं करते और इसके लिए उनके पास पर्याप्त वज़हें हैं। वे वज़हें, जिनसे मनुष्यता पर आस्था बढ़ती है-
'मैं अपने पूरे वज़ूद से
आदमी के आग पर चलने के करिश्मे पर
विश्वास करना चाहता हूं।' (वही, आग पर चलने का करिश्मा, पृष्ठ 45)
'प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक अंर्स्ट फिशर का विश्लेषण, जिसमें उन्होंने मनुष्यता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में कला में अन्तर्व्याप्त इस रहस्य-तत्व के औचित्य और अनिवार्यता को रेखांकित किया है।' xxxxxxx 'जादू का वह अंश हम सबमें बचा रह गया है। मगर केदारनाथ सिंह जैसे किसी बड़े और समर्थ कवि के पास ही अपनी ज़मीन और इतिहास के विशाल कैनवस पर उसे चरितार्थ करने की कलात्मक अंतर्दृष्टि होती है। हम उसका व्याख्या न करें, पर उससे प्यार तो कर ही सकते हैं। वह क्या है; इस प्रश्नाकुलता और खोज में ही उसके होने का सौन्दर्य है।'(चतुर्वेदी, पंकज,, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 155)
परम्परा, मिथ और आस्था को मनुष्य के लिए वे बहुमूल्य मानते हैं और आधुनिकता को धता बताते हुए वे मासूमियत से कहते हैं 'दांत' कविता में-
'कहती थीं दादी
टूटे हुए दांत को गाड़ देना चाहिए
किसी नाली के किनारे की
घास की जड़ में
वह फिर से उग जायेगा
मैंने दादी का स्मरण किया
जैसे चांद में बैठी हुई-
बुढ़िया का स्मरण
और दांत को गाड़ दिया
एक घास की जड़ मे
जानता हूं वह कभी नहीं उगेगा
xxxxxxxx
फिर भी पांचवें-सातवें
जब उधर से गुज़रता हूं
एक बार झांककर ज़रूर देख लेता हूं
कि कहीं मेरा दांत उग तो नहीं रहा।' (वही, दांत, पृष्ठ 78) यहां वे लोक प्रचलित अवधारणाओं को पूरा सम्मान देते हुए उसके कहे पर विश्वास करते हैं वैसा ही जैसा मनुष्य के आग पर चलने के करिश्मे पर। सारे मूल्य तर्क के निर्धारित नहीं होते। ऐसा पृथ्वी पर बहुत कुछ है तर्कातीत है और मूल्यवान, केदार जी उन्हीं की शिनाख़्त करते-करवाते हैं।
केदार जी केवल मनुष्यकेन्द्रित सभ्यता के एकांकी विकास हिमायती कभी नहीं रहे। वे साहचर्य को महत्त्व देते हैं और पूरी प्रकृति को इस यात्रा का सहभागी बनाने के पक्षधर हैं। संसार की हर हलचल की यात्रा उनकी रचनाशीलता का अनिवार्य अंग रही है। उनकी कविताओं में निर्जिव वस्तुओं में जान है और उनके क्रियाकलाप भी। ऐसे में दांत के उग आने की कल्पना उनकी कविता के स्वभाव के अनुरूप ही है। और यही सब वज़हें हैं जो उनके सरोकारों को बड़ा बनाते हैं। और सह अस्तित्व और सह अस्मिता के प्रश्न उनके यहां विविध रूपों में सामने आये हैं। ऐसी एक कविता है ठीकरा। इस कविता में कवि खेत के बीचोबीच पड़े ठीकरे को लेकर चिन्तित है। जब कवि बाल्यावस्था में था तो देखता था कि पिता खेत में पड़े ठीकरों को उठाकर बाहर फेंक देते थे, उसे यह अप्रिय लगता था और वह उनकी आंख बचाकर ठीकरे को फिर खेत में रख देता था। और जबकि पिता नहीं रहे और वह बड़ा हो चुका है तो वह स्वयं ठीकरे को खेत से बाहर फेंकना चाहता है तो उसके अन्दर का पुराना बच्चा उसे रोकता है-
'मेरे हाथ से गिर पड़ता है ठीकरा
झुकता हूं
और उसे उठा लेता हूं दुबारा
पर फेंक नहीं पाता
रख देता हूं वहीं
जहां पड़ा था वह
मुझे लगता है-अब प्रसन्न है ठीकरा
और दमक रहा है धूप में
क्या यह मेरा खेत है?
रास्ते भर ख़ुद से उलझता रहा मैं
एक छोटे से ठीकरे ने
मुझे संशय में डाल दिया था। (वही, ठीकरा, पृष्ठ 133)
कवि के संशय में पड़ने का आशय ही है कि कवि को यह भी लगता है कि ठीकरे का खेत पर हक़ है। वे ठीकरे के विस्थापन के ख़िलाफ़ हैं। यूं भी विस्थापन उनकी कविता का एक महत्त्वपूर्ण पहलू सदैव रहा है और इस संग्रह में भी वे विस्थापन की पीड़ा को शिद्दत से उठाते हैं। यह बात दीगर है कि वे आत्म विस्थापन से उबर चुके हैं और जहां कहीं भी जिस किसी स्तर पर विस्थापन हो रहा हो या जो विस्थापित हो उसके दर्द को पूरी शिद्दत से अभिव्यक्त करते हैं चाहे वह त्रिनीदाद में रह रहे लोगों को विस्थापन हो जो भारत से वहां गये और फिर लौट नहीं आये, जो यह तक भूल चुके हैं कि उनकी मूल जन्म स्थान कहां है और जयपुर बिहार में नहीं राजस्थान में है। उनके दिमाग में अपने मूल स्थान के सम्बंध में अपने पूर्वजों से सुना नक्शा है, जो गड्मगड्ड है-
'क्या वे स्मृति-हीन लोग है?
अपनी बगलवाले आदमी की गहरी उदास कैरेबिनय आंखों में
झांकते हुए मैंने सोचा
मुझे लगा-वहां बिहार के
किसी सूने कछार की ज़रा-सी नमी
कहीं अब भी बची थी
और एक अजब-सी खनक थी उसकी आवाज़ में
बल्कि एक मूर्छना
किसी भूली हुई सुदूर भोजपुरिया धुन की
जिसे उस पूरी भीड़ में मैं
और सिर्फ़ मैं सुन रहा था
उसने बताया उसके पुरखे उदयपुर से थे
जो कहीं बिहार में है' (वही, त्रिनीदाद, पृष्ठ 14/15)
केदार जी विस्थापन और स्मृति से गहराई से जोड़ते दिखायी देते हैं। इस संग्रह में स्मृतियों पर उन्होंने विशेष जोर दिया है और भूलने को मनुष्यता के विकास के लिए अशुभ मानते हैं। भूलने की प्रवृत्ति से वे बेचैन हैं-
'भूलता तो मैं भी जा रहा हूं
कुछ न कुछ रोज़-रोज़
और जो भूलता जा रहा हूं
वह महज़ नीम की पत्तियां
और महुए की टपक नहीं
xxxxxxx
तो क्या मैं भी डायस्फोरा हूं?
कहीं अपने समय के किसी त्रिनीदाद में
एक अजब आप्रवासी।'(वही, त्रिनीदाद, पृष्ठ 16)
भूलने पर एक और कविता है 'झरबेरियां'-
'यही होता है हर बार
हम उन्हें भूल चुके होते हैं पूरी तरह
कि एक दिन अचानक झोंप की झोंप
दिख जाती हैं वे कंटीली झाड़ियों में
और एक गहरी आश्वस्ति में
हम झूका देते हैं सिर
कि चलो अच्छा है
झरबेरियां अब भी होती हैं पृथ्वी पर
फिर धीरे-धीरे
हम उन्हें भूल जाते हैं दुबारा
xxxxxxxxxxxxx
यह भूला हुआ सच परेशान करता है मुझे
कि ये वही झरबेरियां हैं
जिन्हें शायद सभ्यता के पहले दिन ही
सूची से काटकर फेंक दिया गया था बाहर। ' (वही, झरबेरियां, पृष्ठ 57/58)
यहां भी भूलने को विस्थापन के दंश से जोड़कर उन्होंने देखा है।
विस्थापन के अर्थ का वे यहां तक विस्तार कर चुके हैं। जिस इब्राहिम मियां ऊंटवाले की पहचान ही ऊंट हा चला था और उनका चेहरा याद आने से पहले किसी को उनका ऊंट याद आ जाता है जब अरसे बाद कवि उन्हें खोजते एक बस्ती में पहुंचता है तो पाता है कि इब्राहिम मियां की वह विशिष्ट पहचान खो चुकी है-
'उस छोटी-सी बस्ती के उस ओसारे के सामने
जहां सबसे पहले एक मेमना मिला
जो इस कठिन समय में भी
उछल रहा था बाहर
फिर एक बकरी मिली
जो ठीक वहीं बंधी थी
जहां कभी खड़ा रहता था ऊंट
अन्त में इब्राहिम मियां मिले
ऊंट बकरी में कैसे बदल गया?
पूछना चाहता था मैं
पर मैंने खुद को रोका।' (वही, इब्राहिम मियां ऊंटवाले, पृष्ठ 65) कवि के लिए यह मर्माहत और स्तम्भित करने वाली घटना है। इसमें वे उसका विस्थापन महसूस करते हैं।
विस्थापन की स्थितियां सिर्फ़ शहर में हों ऐसा नहीं है गांव में भी हैं। 'भुतहा बाग' कविता में वे बावड़ी, झुरमुट व छतनार पेड़ों के विस्थापन की स्थितियों की चर्चा करते हैं। इसमें उन्होंने उन लोकमान्यताओं की उजले पक्ष को प्रकट किया है जो अंधविश्वासों से जुड़ी हुई थीं किन्तु उनमें लोकमंगल था-गांव के बदले परिवेश में प्रकृति के विस्थापन को वे व्यक्त करते हैं-
'अब रहा नहीं बस्ती में कोई सुनसान
कोई सन्नाटा
यहां तक कि नदी के किनारे का
वह वीरान पीपल भी कट चुका है कब का
सोचता हूं-जब होते थे भूत
तो कम से कम इतना तो करते थे
कि बचाए रखते ते हमारे लिए
कहीं कोई बावड़ी, कहीं कोई झुरमुट,
कहीं निपट निरल्ले में
एकदम अकेला कोई पेड़ छतनार।' (वही, भुतहा बाग, पृष्ठ 120)
यहां तक कि वे दिल्ली में भी बबूल के पेड़ की उपस्थिति को महत्त्वपूर्ण मानते हैं-
'हर बाज़ार में होना ही चाहिए कांटों से लदा
एक बबूल का पेड़
बाज़ार के स्वास्थ्य के लिए।' (वही, दिल्ली में बबूल, पृष्ठ 126)
वे बबूल जैसे वृक्षों के प्रति उनका लगाव हमेशा से रहा है। और दिल्ली जैसे महानगर में उसे देखकर उन्हें हार्दिक प्रसन्नता भी होती है-बबूल है-
'मैंने पहचाना
जैसे भीड़ में कोई बचपन के मित्र को पहचान ले।' (वही, दिल्ली में बबूल, पृष्ठ 125) और वे उसकी उदासी दूर करने के बारे में सोचने लगते हैं। 'वे मनुष्येतर जीवन-सृष्टि में मनुष्यों, प्रकृति के दृश्यों में विभिन्न वस्तुओं और मनुष्यों में प्रकृति के सक्रिय अवयवों के ऐसे मनोहारी सादृश्य खोज लेते हैं कि उन पर ठिठकने, उनस सम्मोहित होने और उनके सम्बंध में सोचने के सिवा और कोई चारा नहीं रहता। वे ऋतुओं, फसलों और उनमें साथ निभाने वाले जानवरों के मिज़ाज़ और तकलीफ़ों को पहचानते हैं, उनसे वाबस्ता हैं।' (चतुर्वेदी, पंकज, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ136/138)
यहां यह उल्लेखनीय है कि जिनके सरोकार बड़े हों कोई ज़रूरी नहीं कि उसकी भंगिमा में ललकार और बढ़चढ़ कर दावे हों। वे विनम्र भी हो सकते हैं। केदार जी की कविता का मुहावरा और लहज़ा व विनम्र और आत्मीयता की मिठास भरा है, जिसमें एक बड़ा अंश करुणा का है। यह अनायास नहीं है कि उनके लगभग हर काव्य संग्रह में गौतम बुद्ध पर कविता रहती है। गौतम बुद्ध का मूल संदेश करुणा ही है। वे बुद्ध से लेकर कबीर तक की यात्रा करते दिखायी देते हैं। बुद्ध सी करुणा और कबीर सी आक्रामकता दोनों मिल जुल कर उनकी काव्य-संवेदना को एक नयी त्वरा प्रदान करते हैं। बुद्ध के संदर्भ में उन्हें पोकरण में किया गया परमाणु परीक्षण भी याद आता है जिसका नाम रखा गया-बुद्ध की मुस्कान। नाम के विरोधाभास को वे व्यक्त करते हैं-
'मेरी समस्या यह है
कि वह कौन-सा नियम है भाषा का
जिससे पोकरण में होने वाला बम-विस्फोट
चुपके से बन गया था बुद्ध की मुस्कान। (वही, बुद्ध की मुस्कान, पृष्ठ 83)
पोकरण के हुए विस्फोट को बुद्ध की मुस्कान नाम देने को वे भाषा का ध्वंस करार देते हैं।
'बारिश में स्त्री' कविता में वे बेलाग लपेट कहने का साहस और बयान मं पारदर्शिता ला पाये हैं। स्त्री पर किसी हद तक चुप-चुप रहने वाले केदार जी की कविता की यह नयी कौंध है। वह कौंध जो पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं पर लिखते हुए पैदा होती रही है किन्तु स्त्री के बारे में वे वैसा अब कर पाये हैं-
'छाता नहीं था उसके पास
मेरे पास होने का सवाल ही नहीं था
सो भींगते रहे हम
भींगते हुए वह
एक क़िताब की तरह खुली थी
जिसके अक्षर पूरी तरह धुल-पुंछ गये थे
और खुशख़त बारिश मानो नये सिरे से
उसके वक्ष पर
कंधों पर
ठुड्डी पर
बालों पर लिखे जा रही थी
कोई तरल इबारत
जिसे पढ़ रही थी-मेरी आंखें
और सुन रहे थे मेरे कान
पानी के इतिहास का वह दुर्लभ क्षण था
जब मेरी आंखों के आगे
एक नयी वर्णमाला का जन्म हो रहा था।' (वही, बारिश में स्त्री, पृष्ठ 86)
मैं इस पर ज़ोर देकर कहना चाहूंगा कि यह केदार जी कविता में भी नयी वर्णमाला का जन्म है। पानी ने पहले घर में तो अपने घोंसले बनाये थे किन्तु उनका स्थान स्त्री के वक्ष, कंधों और ठुड्डी पर नहीं था। स्त्री का जो रूप उनकी आरम्भिक कविताओं में था वह ग्रामीण व पारिवारिक स्त्री का था। यह साथ-साथ उन्मुक्त भीगने वाली स्त्री नहीं थी।
आज जो लोग कविताओं की दुनिया से उदासीन हो चले हैं कि उन्हें अब ऐसी कविताएं पढ़ने को नहीं मिलतीं जिन्हें पढ़कर संतोष मिले उन्हें यह पुस्तक आश्वस्त करती है कि अब भी पढ़ने लायक काफी कुछ लिखा जा रहा है। जहां यह कोशिश जारी है कि-
'मैं तो बस इस शहर की
लाखोंलाख चींटिंयों की मूक रुलाई का
हिन्दी में अनुवाद करना चाहता हूं।' ( वही,चींटियों की रुलाई, पृष्ठ 91)
जहां व्यष्टि और समष्टि के बीच करुणा का एक आत्मीय सम्बंध है-
'हैरान था मैं कि मेरे हिलने
और सूअर की कराह के बीच
कोई पुल नहीं था।' (वही, एक पशु की कराह, पृष्ठ 99)
जो लोग वैज्ञानिक सोच और तार्किकता से लैस हैं उन्हें यह कविता झटका भी देती है और उसे कविता के लिए लगभग गैर ज़रूरी साबित कर देती है। कला की दुनिया में विचार से अधिक भावना और संवेदना अहम रही है उसका यह संग्रह भी प्रमाण है।
इस संग्रह में बहुत गहरे अर्थों में राजनीतिक रुझान की कविताएं भी हैं। स्मारक, चींटियों की रुलाई, इराक युद्ध में एक घायल बच्चे को टीवी पर देखकर, रात की आवाज़ें, बुद्ध से आदि कविताओं की भूमि राजनीतिक है। 'बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर' अद्भुत कविता। बातचीत के सबसे आत्मीय शिल्प में। कविता बर्लिन में शुरू होती है लेकिन उसकी आत्मा भारतीय उपमहाद्वीप है। यह अकारण नहीं है कि कविता में अहमद फराज़ अपनी ग़ज़ल का एक मिसरा भूल जाते हैं। ( मिट्टी की रोशनी, सम्पादक-त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली, 2007, 158, 159)
इस पर केदार जी की टिप्पणी है-
'ग़ज़लों से भर इस उपमहाद्वीप में
मुझे एक भूले हुए मिसरे का अब भी इन्तज़ार है।' (वही, बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर, पृष्ठ 48)
वे अहमद फराज़ के शेर के बहाने भारत-पाक मैत्री की कामयाब़ी का ख़्वाब देखते हैं। आज़ादी की स्वर्णजयंती कविता में देश में आज़ादी की स्थित पर असंतोष व्यक्त करते हैं।
केदार जी बाज़ार को लेकर बेहद चौकन्ने कवि हैं और उसके प्रति गंभीर भी। आदमी और बाज़ार के रिश्ते को लगभग हर संग्रह में वे युगीन संदर्भों में व्याख्यायित करते चले गये हैं। अपनी खबर कविता में वे लिखते हैं-
'कविता और बाज़ार की एक हल्की-सी टक्कर
रोमांचित करती है मुझे।' (वही ,अपनी ख़बर, पृष्ठ 39)
जितेन्द्र श्रीवास्तव को इस संदर्भ में मिर्जा ग़ालिब की याद आती है। उनका कहना है 'बाज़ार को लेकर जो विडम्बनाबोध ग़ालिब के वहां है, वह डेढ़ सौ साल बाद और अधिक तीक्ष्णता के साथ केदार जी के यहां देखने को मिलता है।' xxxxx 'बाज़ार आज के विश्व का यथार्थ बन चुका है। उससे मुंह मोड़ना संभव नहीं दिखता। दो-दो हाथ तो करना ही होगा। यह सकारण है कि केदारजी की कविताओं में बाज़ार बार-बार आता है क्योंकि वह मनुष्य के हर पल उपस्थित रह रहा है।' (श्रीवास्तव, जितेन्द्र, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक-त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली, 2007, पृष्ठ 157/159)
बाज़ार पर केदार जी ने एक दोहा भी लिखा है, जिसमें बाज़ारोन्मुख व्यवस्था को उन्होंने रेखांकित किया है-
'कलम छोड़ दो मेज़ पर, कागज़ रख दो द्वार
सारी दुनिया जा रही, कवि जी चलो बज़ार।' (सिंह, केदारनाथ, ताल्सताय और साइकिल, तीन दोहे, पृष्ठ 100)
वे मनुष्येतर जीवन-सृष्टि में मनुष्यों, प्रकृति के दृश्यों में विभिन्न वस्तुओं और मनुष्यों में प्रकृति के सक्रिय अवयवों के ऐसे मनोहारी सादृश्य खोज लेते हैं कि उन पर ठिठकने, उनस सम्मोहित होने और उनके सम्बंध में सोचने के सिवा और कोई चारा नहीं रहता। वे ऋतुओं, फसलों और उनमें साथ निभाने वाले जानवरों के मिज़ाज़ और तकलीफ़ों को पहचानते हैं, उनसे वाबस्ता हैं। (चतुर्वेदी, पंकज, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ136/138)
'परस्पर विरोधी स्थितियों, अनुभूतियों, विचारों और घटनाओं के संघात से वे कविता में जबरदस्त तनाव, संतुलन और एक किस्म का तार्किक सम्मोहन पैदा करते हैं।xxxकविता और धर्म के बीच का विलक्षण तनाव उनकी इन पंक्तियों में बहुत सघन रूप में व्यक्त हुआ है-
'वह कमबख़्त कविता कुछ चीज़ ही ऐसी है
कि चुप है तो चुप है
वरना प्रार्थना के बीच में भी
शुरू कर देगी चिल्लाना' (चतुर्वेदी, पंकज, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक-त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली, 2007, पृष्ठ 152)
'यह कितना सुखद और विस्मयकारी है कि तरह-तरह के जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदियां और सूरज ही नहीं पत्थरों से भी बातचीत उनके यहां संभव है। इससे कविता की आत्मा के विशाल होने का साक्ष्य तो है ही, इससे अपने समय के बारे में भी विरल अंतर्दृष्टि हासिल होती है। ज़ाहिर है कि यह प्यार बहुत विवेकपूर्ण, सजग और आधुनिक है। उसमें आलोचना का साहस है। इसलिए वह मनुष्य-सम्बंधों में आ रहे बदलाव की सही शिनाख़्त कर पाता है। (चतुर्वेदी, पंकज, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक-त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली, 2007, 136)
इसका उदाहरण पत्थर और अपनी खबर जैसी कविताओं में मिलेगी। पत्थर में कविता में वे पत्थरों को आदमी की तुलना में अधिक संवेदनशील पाते हैं। आदमी के सम्बंध शुष्क होते चले गये हैं। जिसकी ओर वे ध्यान खींचना चाहते हैं। 'अपनी ख़बर में' वे अपने भीतर घटित होती प्रक्रिया की चर्चा करते हुए कहते हैं, जो मनुष्य मात्र के लिए भी है, बस उसे याद दिलाने की आवश्यकता है-
'सच्चाई यह है
कि अपनी त्वचाके भीतर
में आज भी इतना वानस्पतिक हूं
कि जब भी मेरे माथे पर
गिरती है ओस
मेरे भीतर कुछ हो जाता है बेचैन
उससे बात करने के लिए।' (ताल्सताय और साइकिल, अपनी ख़बर, पृष्ठ 41)
इस संग्रह में स्मृतियों के प्रति रुझान हमारा ध्यान बार-बार आकृष्ट करता है। 'स्मृतियों को आधार अनेक कवि बनाते हैं। नॉस्टेल्जिक, स्मृतिजीवी, आत्म-मुग्ध समकालीन चिरकुट भोले प्रेत भी लेकिन किसी भी स्मृति में अपनी, उस सुदूर काल की ऐन्द्रिक संवेदना को, उसी चाक्षुषता, गन्ध, ध्वनियों और भ्रांतियों की सम्पूर्ण आवेगात्मक समग्रता में पुनर्रचित कर पाना हर किसी के वश में नहीं होता। यहां तो देह की समस्त कोशिकाएं जैसे अपनी स्मृति की पुनर्रचना में संलिप्त हो जाती हैं।' (प्रकाश, उदय मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 43) केदार की के यहां स्मृतियों का आधार और स्वरूप भिन्न है। उनकी स्मृति का स्वरूप सामूहिक भी है और निज़ी भी। सबका अपना-अपना भी और सबका साझा भी। इस सामूहिक स्मृति के स्वर को व्यक्त करने के तरीके को समूहगायन कविता में उन्होंने यूं व्यक्त किया है-
'उस गाने में
कोई भी आवाज़
किसी भी आवाज़ से अलग नहीं थी
पर हर गानेवाला
जितना समूह में था
उतना ही अकेला'
(वही, समूहगायन, पृष्ठ 49)
इस दौर की उनकी कविताओं में कौन बसा है इसकी झलक दिनचर्या इन दिनों में देखी जा सकती है-
कुछ ऐसा है कि जब सड़क पर चलता हूं
लगता है पूरे इतिहास में चल रहा हूं
डाकघर जाता हूं और जान पड़ता है
वृहत्कथा के किसी जंगल में आ गया हूं
किताब खोलता हूं तो दिख जाते हैं कालिदास
बंद करता हूं कापी
तो बाणभट्ट की हंसी सुनाई पड़ती है
अभी कल ही की बात है
इंडियागेट पर खड़ा था कि राष्ट्रीय संग्रहालय से एक पुरातन मृदभांड की
गंध ने मुझे आवाज़ दी
चांदनी चौक जा रहा था कि लाल किले की ओर से
एक शिल्पी के कटे हुए हाथ ने मुझे पुकारा
उतर रहा था आश्रम की पुलिया से नीचे
कि नीम की झरती हुई पत्तियों की फांक से
मुझे दिख गये अब्दुर्रहीम खानखाना
उनकी वह अनसुनी कराह
मुझे सुनाई पड़ती रही रातभर नींद में। (वही, पृष्ठ 52)
यह सामूहिक स्मृतियों के प्रति उनकी गहरी दिलचस्पी और उन्हें कविता और भाषा के ज़रिये पुनर्जीवित करने की प्रतिबद्धता है कि उन्होंने पांडुलिपियां, तू फू और ली पै, घोंसलों का इतिहास, पूस की रात: पुनश्च और जब मैं मिलारेपा को पढ़ रहा था जैसी कविताएं लिखीं है। ये कविताएं किसी न किसी स्तर पर हमें अपनी सामूहिक स्मृतियों के क़रीब ले जाती हैं उनकी दिव्यता, प्रासंगिकता, सामूहिकता और उसकी विडम्बनाओं से हमारा साबका कराती हैं और वे इस क्रम में अपने शब्दों, लहज़े, भंगिमा और संवादशीलता के कारण उन्हें पुनर्जीवित करती हैं-
'क्योंकि तब हर देवदार
मेरे घर का दरवाज़ा था
और हर नदी मेरा भूला हुआ रास्ता
वे दुख की खुली हुई आंखें थीं दो
जो हर अक्षर में थीं
और सोई नहीं थीं बरसों से
और लगता था शब्दों की ओट में
कहीं अभी-अभी जन्मा एक भेड़ का बच्चा है
जो सिर्फ़ अपने खड़े होने भर से
बचा सकता है दुनिया को।' (वही, जब मैं मिलारेपा को पढ़ रहा था, पृष्ठ 123) यह अनुभूति केदार जी को तब होती है जब वे मिलारेपा को पढ़ रहे थे। हमें भी वही एहसास केदार जी की कविता को पढ़ते हुए होता है कि उनकी कविता में कहीं कुछ है जिसके खड़े होने भर से बच जायेगी दुनिया।
केदार जी वास्तविक लगते से संसार से सहसा हमें एक अवास्तविक संसार में ले जाते हैं जहां अर्थ की नयी तहें खुलती हैं। एक ही घटना में कई बार सदियों के फासले मिट जाते है और हम विभ्रम की स्थिति में अपने को पाते हैं। एक जादुई खेल उनकी कविता में लगातार ज़ारी रहता है, जो उनकी कविताओं में आरम्भ से ही था जो महज बिम्बों के सृजन के लिए नहीं था बल्कि वे कविता के उस आशय तक ले जाने के लिए ऐसा करते हैं जो उस कविता की परिणति हो सकती है। यूं भी 'रचना का संसार प्रचलित अर्थ में वास्तविक नहीं होता। कोई भी बड़ी रचना स्थूल अर्थ में वास्तव में वास्तव के संसार की व्याख्या नहीं करती, न सिर्फ़ इसी व्याख्या के आधार पर अपने होने का प्रमाण और वैधता चाहती है। अगर वह वास्तव में जगत से कोई संदर्भ लेती भी है, तो सिर्फ़ अपनी अस्पष्टता को स्पष्ट करने के लिए। हालांकि उसी के माध्यम से हम वास्तविकता का संज्ञान हासिल करते हैं जो हमें सिर्फ़ रचना से ही प्राप्त हो सकता है।'(प्रकाश, उदय मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 43)
तू फू और ली पै कविता में केदार जी स्वयं कहते हैं-
'यह आठवीं सदी की कोई शाम रही होगी
यद्यपि इतिहास में इसका कोई ज़िक्र नहीं है।
' कवि यह भली भांति जानता है कि जिस घटना का वह ज़िक्र कर रहा है वह वास्तव में इतिहास में घटित नहीं भी हो सकती किन्तु झूठ और कल्पना भी इतिहास से बड़ी घटना हो सकती है कई बार वह इतिहास को चुनौती दे सकती और कई बार वह इतिहास न होते हुए भी इतिहास ही होती है। ऐसी एक रचना है कथाकार प्रेमचंद की कहानी पूस की रात। यह कहानी वास्तविक इतिहास न होकर भी भारतीय कृषक समाज का सबसे विश्वस्त इतिहास है। यह अनायास नहीं है कि केदार जी उसे ऐतिहासिक घटना मानकर भी उसका पुनर्सृजन करते हैं। कृति में उसकी संवेदना के मूल भाव से छेड़छाड़ किये बिना भी वे उसकी संवेदनशीलता और बढ़ा देते हैं। यह पुनर्सृजन वे उन प्राणियों के लिए करते हैं जिनकी संवेदना मनुष्य की संवेदना के आगे लगभग गौड़ हो गयी थी। यहां कुत्ते और नीलगायों का पक्ष उन्होंने रखा है। इससे प्रेमचंद की कहानी का स्वर महाकाव्यात्मक हो गया है। वे गंभीरता से यह सोचते हैं कि जब हलकू गया होगा बगीचे में सूखी पत्तियां बटोरने तब कुत्ता क्या कर रहा होगा। केदार जी ने कविता में कहानी रची है किन्तु यह कविता और अधिक काव्यात्मक हो जाती है। इसमें न सिर्फ़ हल्कू से किये गये खेल का वर्णन है जिसमें कुत्ता जानबूझ कर हार जाता है। केदार जी की पुनर्रचना में नीलगायों फिर से प्रवेश करती हैं और खडी़ हो जाती हैं इस बोध के साथ कि उनसे गलती हो गयी वे नहीं जानती कि उन्होंने क्या किया है। केदार जी की कविता में एकायक महाभारत कालीन पात्र प्रकट होते हैं-
'गांव वालों ने देखा
कोहरे से निकलकर एक पतली सी पगडंडी पर
युधिष्ठिर और उनकी कुत्ता
दोनों हिमालय से वापस आ रहे हैं
बर्फ़ ने
उन्हें गलाने से इनकार कर दिया है।' (वही, पूस की रात: पुनश्च, पृष्ठ 31) यहां आकर प्रेमचंद की बीसवीं सदी की कहानी महाभारत काल में प्रवेश कर जाती है और कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता।
केदार जी ने ऐसी कविताएं भी इस संग्रह में दी हैं जिनका सीधे-सीधे अर्थ निकाल पाना मुश्किल है और यह बता पाना भी मुश्किल कि उनकी कविता का अभिप्राय क्या है किन्तु उन कविताओं में एक कौंध है, एक आह्लाद, एक अनुभूति, एक अनुभव। 'शायद केदारनाथ सिंह की कविता पर जिस समकालीन कवि ने सबसे ज़्यादा लिखा है, वे हैं अरुण कमल। इसलिए उनका भी निष्कर्ष खासा दिलचस्प और प्रामाणिक है-इतना सारा कुछ लिख लेने के बाद भी लगता है कि उनकी कविताओं में कुछ ऐसा है, जिसकी व्याख्या संभव नहीं, जिसे बस अनुभव किया जा सकता है...कविता का वह राज़, जिसे सब जानें, पर किसी से कह न सकें, यही किसी भी कविता को कविता बनाता है।' (चतुर्वेदी, पंकज,, मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 154) इस प्रकार की कविताओं में खरहे, तलाश, लहरतारा, पतझड़, पानी था मैं, ईश्वर और प्याज और अमरूद आदि।
अमरूद कविता की बानगी देखें-
मैं बिना किसी मध्यस्थ के
छिलकों और बीजों के बीच से होते हुए
सीधे अमरूद के धड़कते हुए दिल तक पहुंचना चाहता हूं
जो कि उसका स्वाद है।' ( सिंह, केदानाथ, ताल्सताय और साइकिल, अमरूद, पृष्ठ 103)
केदार जी की कविताएं का सीधे आस्वादन तो किया जा सकता है लेकिन वे कैसी और क्या है यह व्यक्त करने के लिए भाषा जैसा का कोई उपकरण मध्यस्थ बने यह संभव नहीं जान पड़ता।
शायद इन्हीं कविताओं को लक्ष्य कर उदय प्रकाश ने कहा है-'केदारनाथ सिंह की कविताओं में वर्ण, पद और ध्वनियों की इस गतिकीयता या काइनेटिक्स को कुछ आलोचक उनकी कविता की ही लिरिकैलिटी या संवेग समझने की भूल कर बैठते हैं। दरअसल उनकी कविता के काइनेटिक्स की अपूर्व प्रक्रिया में, अविच्छिन्न स्फोटों के साथ जो संरचना सामने आती है, उसके विभाजन या विच्छेदन के द्वारा आप कोई फल नहीं पा सकते। भृतहरि और देरिदा ही नहीं, वोलानिसोव जैसे मार्क्सवादी विचारक भी इसीलिए वाक्य तथा वाक्यार्थ की अखंडता को सबसे पहले स्वीकार करते हैं। केदारनाथ सिंह की कविताओं के पाठ के साथ तो यह अनिवार्यता की हद तक ज़रूरी है।' (प्रकाश, उदय मिट्टी की रोशनी, सम्पादक, त्रिपाठी, अनिल, शिल्पायन, दिल्ली,2007, पृष्ठ 43)
संग्रह में उनकी दो कविताएं हैं जो उनके पुराने दिनों से सम्बंधित हैं। एक है पडरौना की याद में लिखी गयी कविता शहरदल, जहां उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का काफी अरसा गुज़ारा है दूसरा कैलाशपति निषाद की स्मृति में लिखी गयी कविता जो, उन्होंने अपने पुराने दिनों के मित्र के दिवंगत होने पर लिखी है। पडरौना को कविता में रखकर ऐतिहासिक बना दिया है और उसके स्वभाव को पूरे गरिमामय ढंग से दर्ज़ किया है इस टिप्पणी के साथ कि-
शायद दुनिया उन्हीं छोटे-छोटे शहरों के
ताप से चलती है
जिन्हें हम-आप नहीं जानते।' ( सिंह, केदानाथ, ताल्सताय और साइकिल, शहरबदल, पृष्ठ 92) सो उन्होंने पडौराना के ताप से दुनिया को परिचित कराया है। यह वही उपक्रम है ताल्सताय की साइकिल के इतिहास में प्रवेश की तरह। ताल्सताय का यास्नाया पोलियना की कच्ची सड़क पर साइकिल सीखते हुए गिरने से वह साइकिल इतिहास में प्रवेश कर गयी। केदार जी के रास्ते पडौराना के इतिहास में प्रवेश का मार्ग बनी है यह कविता।
संग्रह में नामों के अर्थ पर उन्होंने विशेष गौर किया है जिसमें एक नाम पडरौना भी है 'जिसके नाम का उच्चारण/ एक लड़की को लगता था ऊंट के कोहान की तरह।' (वही, पृष्ठ 93) एक अन्य कविता में नाम को लेकर उनका कौतुक देखें-
'बापू-यह शब्द
दो अक्षरों से मिलकर बना है
बा+पू
बा -चलो ठीक है
पर पू हमें ज़्यादा आनन्द देता है
पता नहीं क्यों?' (वही, तीन गद्यांश-एक स्कूली अभ्यास-पुस्तिका से उतारे गये, पृष्ठ112)
अपने मित्र कैलाशपति निषाद पर उन्होंने जो कवि लिखी है वह साधारण की गरिमा की स्थापना है। बुद्ध, ताल्सताय, तू फू और ली पै, कबीर, निराला, त्रिलोचन पर कविता लिखने वाले केदार जी ने जिस कैलाशपति पर कविता लिखी है 'वह निहायत साधारण, थोड़ा बहुत पढ़े हुए, शायद किसी स्कूल की छोटी कक्षा के मास्टर और बिल्कुल देहाती। कुर्ता, धोती, चप्पल पहने और सामान के नाम पर कंधे पर सिर्फ़ एक गमछा।xxxx केदार जी ने एक दिन बताया कि निषाद जी नहीं रहे। उनकी कुछ बातें भी करते रहे। निषाद जी की महागरीबी और स्वाभिमान की। कैसे वे केदार जी को अपने गांव लेकर गये थे, जहां केदार जी ने पाया कि सर्दी में भी सारा परिवार केवल आधी धोती बांधे और आधी ओढ़े सोता था। कैसे केदार जी की सहायता से उन्होंने एक छोटे से स्कूल में नौकरी पायी थी और कैसे निषाद जी की मित्रता केदार जी के पिता और केदार के साथ वर्षों तक बनी रही।' (, सिंह, के बिक्रम, साधारण की गरिमा, जनसत्ता, कोलकाता, 2 मार्च 2008, पृष्ठ 5 )
इस कविता में केदार जी ने कैलाशपति के बहाने साधरण की महानता की स्थापना की भी की है और उनके व्यक्तित्व का भावचित्र भी खींचा है-
'सिर्फ़ गमछा भी
हो सकता है आदमी की सबसे बड़ा मित्र
एक साइकिल भी उतनी ही निष्ठा
और उतने ही ताप से निभा सकती है प्रेम
वर्षों तक
एक चुप रहना भी हो सकता है
भरी सभा में सबसे तेज बोलना
एक जोड़ी चप्पल भी काफ़ी है
सारे भूगोल को नाप डालने के लिए'। ( वही, कैलाशपति निषाद की स्मृति में, पृष्ठ 129)
यह तक तो कविता कैलाशपति का शब्द व भाव चित्र बनी रहती है जिसके बाद केदार जी की कविता स्वतंत्र अपनी उड़ान पर निकल जाती है और काव्य में साधारण की परिधियों का विस्तार करती है-
'एक झांझ
एक मजीरा
एक पुराना ढोलक भी पहुंचा सकता है
उदात्त की ऊंचाइयों तक।' (वही)

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